एक छोटे से गाँव में एक चालाक लेकिन बहुत लालची कौवा रहता था। उसका नाम था — काली। काली रोज़ाना गाँव के बाज़ार में घूमता और दूसरों का खाना चुराने की फ़िराक में रहता।
एक दिन, गाँव की एक बुढ़िया माँ ने अपनी रसोई में मीठी रोटी बनाई। उस रोटी की खुशबू इतनी प्यारी थी कि पूरा गाँव महक उठा। काली कौवा उस महक से खिंचा चला आया

जैसे ही बुढ़िया माँ खिड़की के पास रोटी ठंडी होने रखकर अंदर गईं, काली कौवे ने झट से उड़कर रोटी चुरा ली! वह रोटी को मुँह में दबाकर पास के पीपल के पेड़ पर जा बैठा।

रोटी की मिठास को देखकर उसके मन में और लालच आ गया। उसने सोचा — “काश मुझे और रोटियाँ मिल जातीं
जब काली उस रोटी को खा ही रहा था, तब वहाँ से दो और कौवे गुज़रे। उन्होंने मीठी रोटी देखी और काली से माँगने लगे। काली ने लालच में आकर कहा — “नहीं दूँगा! यह सारी मेरी है!”
तभी उसने जोर से चोंच खोली और रोटी नीचे गिर गई। नीचे एक कुत्ता बैठा था, उसने फटाफट रोटी खा ली। काली का सारा लालच धरा का धरा रह गया

काली कौवा शर्म से झुका बैठा रहा। उस दिन उसे समझ आया — “लालच बुरी बला है।” जो मिला है उसमें खुश रहो, वरना वो भी चला जाता है।

बुढ़िया माँ ने काली को दूर से देखा। उन्हें तरस आया और उन्होंने एक छोटी रोटी का टुकड़ा काली की तरफ़ फेंका। काली ने इस बार धीरे-धीरे, शुक्रगुज़ार होकर खाया
कहानी की सीख (Moral of the Story)
“लालच बुरी बला है — जो मिला है उसमें संतोष रखो।”
जब हम जरूरत से ज़्यादा पाने की चाह में पड़ते हैं, तो जो हमारे पास है वो भी खो देते हैं। संतोष और ईमानदारी ही सच्ची दौलत है।